कोई आश्चर्य नहीं कि यदि आपकी कोई वस्तु गुम हो जाए और आप एक ऐसा मंत्र पढ़ें जिससे कि वह वस्तु आपको शीघ्र ही मिल जाए जी हां ऐसा हो सकता है कैसे आइए जानते हैं.

गुम हुई वस्तु या व्यक्ति के विषय में अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं अनेक बार ऐसा हुआ है कि हमें सफलता मिल जाती है परंतु यहां पर अंधविश्वास की कोई गुंजाइश नहीं है और ना ही स्थान है विज्ञान के लिए क्योंकि ज्योतिष या मंत्र विज्ञान अपने आप में संपूर्ण सत्य है इन्हें जानने वाला स्वयं जानता है कि यह कैसे काम करते हैं.

आकर्षण और सम्मोहन में फर्क

आकर्षण और सम्मोहन में फर्क इतना है कि किसी को मोहित करना सम्मोहन है तथा किसी को आकर्षित करना आकर्षण है सम्मोहन व्यक्ति विशेष से संबंधित है जबकि आकर्षण किसी वस्तु का भी किया जा सकता है.

जी हां मंत्र विज्ञान में ऐसे अनेक मंत्र है जिनका प्रयोग आकर्षण के लिए किया जाता है यह मंत्र अत्यंत गोपनीय है जिन्हें इन मंत्रों का अभ्यास है वह इन मंत्रों से अपेक्षित कार्य कर सकता है.

आकर्षण या गुम हुई वस्तु के लिए अनेकों मंत्र हो सकते हैं परंतु मेरे अपने अनुभव में कार्तवीर्यार्जुन का मंत्र आज तक अनेकों बार रामबाण सिद्ध हुआ है.

कार्तवीर्यार्जुन का मंत्र

कार्तवीर्यार्जुन का मंत्र गुरु द्वारा एक योग्य शिष्य को गुरु मंत्र के साथ दिया जाता है जिसमें गुरु की भी शक्ति होती है परंतु मंत्र से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि कार्तवीर्यार्जुन कौन है और आकर्षण में उन्हीं का मंत्र क्यों विशेष है.

कौन हैं कार्तवीर्यार्जुन

महाभारत में हैहयवंशी कार्तवीर्य अर्जुन का उल्लेख आता है। उसके हजारों हाथ थे। उसका जन्म भगवान दत्तात्रेय के आशीर्वाद से हुआ था। उसने नर्मदा नदी के किनारे स्थित महिष्मती नगरी के कर्कोटक्वंशी नागराज को हराकर महिष्मती को अपनी राजधानी बनाया था।

महाभारत में हैहयवंशी कार्तवीर्य अर्जुन का उल्लेख आता है। उसके हजारों हाथ थे। उसका जन्म भगवान दत्तात्रेय के आशीर्वाद से हुआ था। उसने नर्मदा नदी के किनारे स्थित महिष्मती नगरी के कर्कोटक्वंशी नागराज को हराकर महिष्मती को अपनी राजधानी बनाया था।

महाभारत के अनुसार वो अपने समय का सबसे बड़ा योद्धा था जिसने अपने बल से पूरी पृथ्वी को जीत लिया था। बल, दान, ज्ञान,बलिदान,  सीखना, तपस्या, युद्धक्षेत्र, पराक्रम, शक्ति, दया, उदारतामें कोई उसके समकक्ष भी नहीं था। यहाँ तक कि उसने रावण को भी हराकर बंधक बना लिया था। 

एक बार जमदग्नि ऋषि के आश्रम में जाने पर उसने वहाँ कामधेनु गाय को देखा। कामधेनु गाय सभी मनोरथ पूर्ण करने वाली गाय थी। उसने जमदग्नि ऋषि से गाय को मांगा लेकिन उनके ना करने पर उसने जमदग्नि ऋषि का अपमान किया और उनका वध कर दिया। जब जमदग्नि ऋषि के पुत्र परशुराम को पिता के वध का पता चला तो परशुराम जी ने अपने फरसे से उसकी हजारों भुजाओं को काट डाला और उसका वध कर दिया। 


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